नई पीढ़ी के ‘ग्रीन पटाखों’ पर विवाद, अंतिम निर्णय करेगा सर्वोच्च न्यायालय
सीएसआईआर-नीरी ने प्रदूषण में 40 से 60 प्रतिशत कमी का दावा किया, सीपीसीबी ने प्रतिबंधित बेरियम नाइट्रेट की मौजूदगी पर जताई आपत्ति
नई पीढ़ी के ग्रीन पटाखों के व्यावसायिक उत्पादन को अनुमति देने के मुद्दे पर दो सरकारी संस्थानों की अलग-अलग राय सामने आई है। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान—सीएसआईआर-नीरी—ने नए फॉर्मूले को स्वीकृति दी है, जबकि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इसमें प्रतिबंधित रसायन होने का हवाला देते हुए आपत्ति जताई है।
सीएसआईआर-नीरी का दावा है कि नई संरचना वाले पटाखों से प्रदूषण में 40 से 60 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। संस्थान को सरकार ने उद्योग के सहयोग से अगली पीढ़ी के ग्रीन पटाखे विकसित करने की जिम्मेदारी दी थी। परीक्षणों में पार्टिकुलेट मैटर उत्सर्जन में करीब 30 प्रतिशत और ठोस अपशिष्ट में 32 प्रतिशत कमी का दावा किया गया है।
इसके विपरीत, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि नए पटाखों में बेरियम नाइट्रेट मौजूद है। यह रसायन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित किया जा चुका है, इसलिए ऐसे उत्पादों के व्यावसायिक निर्माण की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
सीपीसीबी ने यह भी कहा है कि प्रदूषण में कमी के दावे की तुलना बेहतर कम-उत्सर्जन वाले पटाखों और बेरियम रहित ग्रीन पटाखों से नहीं की गई। इसलिए केवल सामान्य पटाखों से तुलना के आधार पर नई संरचना को पर्यावरण-अनुकूल मानना पर्याप्त नहीं होगा।
दोनों संस्थानों के विरोधाभासी मतों के बाद पर्यावरण मंत्रालय ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर निर्णय अदालत पर छोड़ दिया है। प्रस्तावित रासायनिक संरचनाएं पेट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन—पेसो—को भी भेजी गई थीं और नियामक संस्था ने इन्हें अनापत्ति प्रमाणपत्र दिया था।
यह विवाद प्रदूषण नियंत्रण, वैज्ञानिक नवाचार और न्यायालय द्वारा प्रतिबंधित रसायनों के अनुपालन के बीच संतुलन का प्रश्न बन गया है। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय ही तय करेगा कि इन पटाखों का व्यावसायिक उत्पादन संभव होगा या इनके फॉर्मूले में और बदलाव करने पड़ेंगे।
