यमुना प्रदूषण पर लगाम की तैयारी, एनजीटी के समक्ष पेश हुआ रोडमैप

दिल्ली में प्रतिदिन 4,659 टन ठोस कचरा बिना प्रसंस्करण के लैंडफिल स्थलों पर पहुंच रहा, अधूरा सीवर नेटवर्क भी बड़ी चुनौती

 

दिल्ली में बढ़ते ठोस कचरे और यमुना में पहुंच रहे अनुपचारित सीवेज को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के समक्ष विस्तृत प्रगति रिपोर्ट एवं कार्ययोजना प्रस्तुत की है। लक्ष्य वर्ष 2028 तक ठोस कचरा प्रबंधन और सीवेज उपचार व्यवस्था को मजबूत करना है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली नगर निगम क्षेत्रों से प्रतिदिन करीब 12,862 टन ठोस कचरा निकलता है, जिसमें से लगभग 12,500 टन एकत्र कर लिया जाता है। इसके बावजूद केवल 7,841 टन, यानी करीब 63 प्रतिशत कचरे का ही प्रसंस्करण हो रहा है। शेष 4,659 टन कचरा बिना प्रसंस्करण के लैंडफिल स्थलों पर भेजा जा रहा है।

 

एनडीएमसी के करीब 300 टन और दिल्ली छावनी बोर्ड के लगभग 62 टन दैनिक कचरे का शत-प्रतिशत निस्तारण वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्रों के माध्यम से किया जा रहा है।

 

छह बड़ी परियोजनाओं पर काम

 

नगर निगम कचरा प्रबंधन क्षमता में प्रतिदिन 7,650 टन की अतिरिक्त वृद्धि के लिए छह बड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहा है। ओखला और तहखंड के वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्रों में एक-एक हजार टन प्रतिदिन अतिरिक्त क्षमता विकसित की जाएगी।

 

ओखला में 300 टन और गाजीपुर में 350 टन क्षमता के बायो-सीएनजी संयंत्र लगाए जाने की योजना है। डेयरी कचरे के निस्तारण के लिए नांगली डेयरी में एक संयंत्र संचालित है, जबकि गोयला और घोघा डेयरी में 200-200 टन क्षमता के बायोगैस संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं।

 

सीवर नेटवर्क की कमियां बनीं बाधा

 

दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 3,636 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है। उपचार क्षमता मांग के करीब 90 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है, लेकिन सीवर नेटवर्क की कमियों और कुछ क्षेत्रों में उचित संपर्क होने के कारण अनुपचारित सीवेज यमुना तक पहुंच रहा है।

 

दिल्ली जल बोर्ड के पास 37 सीवेज उपचार संयंत्र हैं, जिनकी कुल क्षमता लगभग 3,702 एमएलडी है। हालांकि करीब 249 एमएलडी क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा है। जांच में 29 संयंत्र निर्धारित मानकों के अनुरूप पाए गए, सात में सुधार कार्य जारी है और एक संयंत्र मरम्मत के कारण अस्थायी रूप से बंद है।

 

यमुना की सफाई के लिए केवल उपचार क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। सीवर नेटवर्क का विस्तार, संयंत्रों की पूरी क्षमता का उपयोग, नालों का प्रभावी संपर्क और ठोस कचरे का वैज्ञानिक प्रसंस्करण भी समान रूप से आवश्यक है। योजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन ही प्रदूषण नियंत्रण के इस रोडमैप की वास्तविक सफलता निर्धारित करेगा।