गणेशोत्सव: आस्था, विवेक और रोजगार का संगम बना महाराष्ट्र का पेण
गणेशोत्सव भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का ऐसा पर्व है, जिसमें भक्ति के साथ विवेक, सामाजिक चेतना, लोककला और आजीविका का अनूठा संगम दिखाई देता है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और विवेक के देवता के रूप में पूजा जाता है, वहीं महाराष्ट्र के अनेक क्षेत्रों में गणेश प्रतिमा निर्माण हजारों परिवारों की जीविका का महत्वपूर्ण आधार भी बन चुका है। इस परंपरा का एक प्रमुख केंद्र रायगढ़ जिले का पेण है, जिसकी पहचान देश-विदेश तक पहुंचने वाली गणेश प्रतिमाओं से जुड़ चुकी है।
गणेश पूजा का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। भारतीय दर्शन में भगवान गणेश विवेक, संयम, सही निर्णय और शुभारंभ के प्रतीक माने जाते हैं। किसी भी कार्य की शुरुआत से पहले गणपति का स्मरण इसी भावना को दर्शाता है कि सफलता केवल प्रयास से नहीं, बल्कि सही दिशा, धैर्य और विवेकपूर्ण निर्णय से भी प्राप्त होती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से गणेश पूजा मनुष्य को भीतर की बाधाओं—अहंकार, भ्रम, लोभ, क्रोध और असमंजस—से मुक्ति पाने की प्रेरणा देती है। यही कारण है कि गणपति को ‘विघ्नहर्ता’ कहा जाता है। विवेकपूर्ण जीवन व्यक्ति को सही और गलत में अंतर समझने, कठिन परिस्थितियों में संतुलन बनाए रखने और जीवन के निर्णयों को स्पष्टता के साथ लेने की शक्ति देता है।
पेण: गणेश प्रतिमा निर्माण का प्रमुख केंद्र
महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले का पेण क्षेत्र गणेश प्रतिमा निर्माण की अपनी विशिष्ट परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां के गांवों में सैकड़ों कार्यशालाएं संचालित होती हैं, जिनमें हजारों कारीगर प्रतिमाओं को आकार देने, रंगने, सजाने और अंतिम रूप देने में जुटे रहते हैं।
पेण में बनने वाली प्रतिमाएं मुंबई, महाराष्ट्र के विभिन्न शहरों और देश के अन्य राज्यों तक भेजी जाती हैं। कुछ प्रतिमाएं विदेशों तक भी पहुंचती हैं। इसके कारण यह कला केवल धार्मिक परंपरा नहीं रह गई है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बन चुकी है।
गणेशोत्सव का मौसम शुरू होने से कई महीने पहले ही कारीगरों का काम तेज हो जाता है। एक फीट से कम आकार की छोटी प्रतिमाओं से लेकर लगभग 14 फीट तक की बड़ी प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं। प्रतिमा का मूल्य उसके आकार, डिजाइन, सामग्री और सजावट के अनुसार बदलता है।
छोटी प्रतिमाओं की कीमत कुछ सौ रुपये से शुरू होकर बड़ी और विशेष रूप से डिजाइन की गई प्रतिमाओं के लिए हजारों रुपये तक पहुंच सकती है।
एक कार्यशाला का कारोबार लाखों से करोड़ तक
पेण की गणेश प्रतिमा निर्माण अर्थव्यवस्था का दायरा लगातार बढ़ा है। एक स्थापित कार्यशाला का वार्षिक कारोबार लगभग 30 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये या उससे अधिक तक पहुंच सकता है। प्रतिमा निर्माण से जुड़े कलाकारों के अलावा रंगसाज, मूर्तिकार, पैकिंग कर्मी, परिवहन व्यवसायी और सजावट से जुड़े लोगों को भी इससे रोजगार मिलता है।इस उद्योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक प्रतिमा तैयार होने तक कई स्तरों पर स्थानीय श्रम और कौशल का उपयोग होता है। इस कारण गणेशोत्सव के आसपास बनने वाली आर्थिक गतिविधि केवल मूर्तिकारों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि पूरी स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला को गति देती है।
हजारों परिवारों के लिए आजीविका
पेण और उसके आसपास के गांवों में बड़ी संख्या में परिवार प्रतिमा निर्माण पर निर्भर हैं। कई परिवार पीढ़ियों से इस परंपरा से जुड़े हुए हैं। परिवार के अलग-अलग सदस्य मिट्टी तैयार करने, सांचे बनाने, मूर्ति गढ़ने, रंग भरने, सजावट और पैकिंग जैसे अलग-अलग कार्य करते हैं।
कुछ कार्यशालाओं में प्रत्यक्ष रूप से दर्जनों कारीगर काम करते हैं, जबकि बड़ी संख्या में लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार भी मिलता है। कई कारीगर गणेशोत्सव का काम पूरा होने के बाद अन्य धार्मिक प्रतिमाओं के निर्माण में जुट जाते हैं, जिससे वर्ष के अन्य महीनों में भी उनकी आय का साधन बना रहता है।
परंपरागत कला को मिली औपचारिक पहचान
पेण की गणेश प्रतिमाओं को भौगोलिक संकेतक यानी जीआई टैग मिलने से स्थानीय कला को विशेष पहचान और संरक्षण मिला है। जीआई टैग किसी क्षेत्र विशेष से जुड़ी कला, उत्पाद या परंपरा की विशिष्टता को प्रमाणित करता है।
